चूरू पुलिस के महकमे को झकझोरने वाला मामला, महिला कांस्टेबल ने लगाए सामूहिक दुष्कर्म के आरोप
चुरु। देशी रिपोर्ट
जिले में वर्दी पहनकर कानून की रक्षा करने वाली एक महिला कांस्टेबल की आपबीती ने पूरे पुलिस महकमे को भीतर तक झकझोर दिया है। महिला कांस्टेबल की वर्षों तक खामोशी, डर और दबाव में जीती रही इस महिला ने आखिरकार हिम्मत जुटाकर अपने ही विभाग के कुछ लोगों पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं।
महिला कांस्टेबल ने आरोप लगाया है कि साल 2017 में ड्यूटी का बहाना बनाकर उसे तड़के घर से बुलाया गया। भरोसा था कि वह अपने विभाग के लोगों के बीच सुरक्षित है, लेकिन उसी भरोसे को तोड़ते हुए उसे एक होटल ले जाया गया। वहां कथित तौर पर नशीला पदार्थ पिलाकर सामूहिक दुष्कर्म किया गया।पीड़िता का कहना है कि यह कोई एक रात की घटना नहीं थी, बल्कि डर, धमकी और मजबूरी के साये में यह सिलसिला सात साल तक चलता रहा।जब महिला कांस्टेबल का दर्द हद से बढ़ गया, तो महिला कांस्टेबल ने जिला पुलिस अधीक्षक जय यादव के सामने उसके साथ हुई घटना की जानकारी दे डाली। एसपी के निर्देश पर मामले की आंतरिक जांच हुई और शुरुआती तथ्यों के आधार पर पूर्व SHO समेत चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। पीड़िता का मेडिकल परीक्षण भी कराया गया है।
हालांकि इस पूरे मामले में एक पेचीदा पहलू भी सामने आया है। शिकायतकर्ता महिला कांस्टेबल खुद पिछले दो महीनों से निलंबित है। उस पर ड्यूटी से गैरहाजिर रहने और कुछ अन्य मामलों में संलिप्तता के आरोप हैं। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मामला पुराना और संवेदनशील है, इसलिए हर एक पहलू को बिना किसी पूर्वाग्रह के जांचा जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार यह मामला सिर्फ एक FIR का नहीं है, बल्कि यह हमारे सिस्टम के भीतर गहराई से जड़ जमाए उस डर और ताकत के दुरुपयोग पर भी सवाल खड़े करता है, जिसकी वजह से कई पीड़ितो की आवाज़ें सालों तक खामोश रहने को मजबूर हो जाती हैं। जब कोई महिला अपने ही विभाग, अपने ही साथियों और अपने ही वरिष्ठ अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाने की हिम्मत करती है, तो यह सिर्फ एक व्यक्तिगत संघर्ष नहीं रह जाता, बल्कि पूरी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर आईना बन जाता है।
यह भी एक सच्चाई है कि जब आरोप सत्ता या वर्दी से जुड़े लोगों पर लगते हैं, तो निष्पक्ष जांच की उम्मीद और भी संवेदनशील हो जाती है। जांच एजेंसियों पर जिम्मेदारी है कि वे बिना किसी पूर्वाग्रह, बिना किसी दबाव और बिना किसी जल्दबाज़ी के हर तथ्य की गहराई से पड़ताल करें। पीड़िता और आरोपी—दोनों के अधिकार और गरिमा की रक्षा करना कानून का दायित्व है।फिलहाल जांच जारी है और अंतिम सच उसी प्रक्रिया से सामने आएगा। लेकिन इतना तय है कि यह मामला पुलिस व्यवस्था के लिए आत्ममंथन का मौका है। यह देखने का वक्त है कि क्या सिस्टम पीड़ित को सुरक्षा और न्याय का भरोसा दिला पाता है, या फिर डर और ताकत का संतुलन एक बार फिर इंसानियत पर भारी पड़ जाता है।

